स्त्रियाँ पैदा नहीं होती, बनायी जाती हैं

स्त्रियाँ पैदा नहीं होती, बनायी जाती हैं

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This Article is written by Shailendra Pandey pursuing B.A.LLB from Gram Nehru Bharti University, Prayagraj.

प्रकृति की स्वयं के अंगो के साथ सामंजस्य स्थापित करने की उत्कृष्ट विशेषता है | प्रत्येक अवयव जिसका जन्म प्रकृति के अन्तगर्त हुआ है, जैविक अजैविक रूप में विघमान है | वे जैविक घटकों का वर्गीकरण नर तथा मादा के रूप में किया गया इसके अन्तगर्त सभी पशु, पक्षी तथा मनुष्य आते हैं | जैविक नर-मादा की पहचान को मनुष्य समाज ने एक नया सांस्कृतिक नाम दिया-स्त्री तथा पुरुष | जहाँ ‘स्त्री’ से सम्बंधित कुछ विशेष सामाजिक मानक एवं व्यवहार तय कि गए जो ‘पुरुष’ से निम्नतर माने गए | (शारीरिक-मानसिक, सामाजिक- सांस्कृतिक, आर्थिक-राजनीतिक जैसे सभी रूपों में) | परिणामस्वरुप प्रकृति के समानता (सामंजस्य) के नियम पर मानव द्वारा ही प्रश्न चिन्ह लगा दिया गया | आज जीवन प्रदाता ही जीवन प्राप्ति हेतु संघर्षरत है | इस संघर्ष को महिला सशक्तिकरण कि प्रक्रिया कहा जाता है |

जीवन के प्रत्येक मार्ग, घटक, स्थिति में महिलाओं की स्वनिर्णायक भागीदारी तथा गरिमा, अधिकारों तथा कर्तव्यों के प्रति महिलाओं का पुर्नजागरण ही महिला सशक्तिकरण है | सामाजिक , आर्थिक , राजनीतिक, सांस्कृतिक जैसे जीवन के सभी आयामों में स्त्रियों की स्वनिर्धारण क्षमता की स्थापना ही महिला सशक्तिकरण का स्वरूप है |

महिला सशक्तिकरण का तात्पर्य महिलाओं का पुरुषकरण नहीं है अपनी विशिष्टता को बनाए रखते हुए समस्त मानवाधिकारों की प्राप्ति ही महिला सशक्तिकरण है |

हमें महिला अधिकारों की नहीं मानवाधिकारों की बात करनी चाहिए महिलाएं कोई वशिष्ट प्राणी नहीं मानव ही है क्या इसे स्वीकृत करना इतना मुश्किल है |” – सद्गुरु जे वी

इतिहास में स्त्रियों की सामाजिक स्थिति की विवेचना की जाए तो यह तथ्य स्थापित होता है कि प्राचीन समाज स्त्रियों के प्रति अपेक्षाकृत अधिक समता मूलक एवं उदार था | ऋग्वेद उद्घोषित करता है कि ‘किसी पदार्थ के समान अर्धांश होने के कारण महिला एवं पुरुष प्रत्येक संबंध में समान होते है | इसीलिए वैदिक परम्पराओं में स्त्रियों का स्थान परिणामोंमुखी था, जैसे – घोषा, अपाला, लोपमुद्रा, सिक्ता जैसी मंत्ररचयिता एवं विदुषी महिलाएं | राजनीतिक संस्थाओ ‘सभा’ तथा ‘समिति’ को प्रजापति की दो पुत्रियां’ कहना उच्च स्त्री गरिमा का परिचायक है |

वैदिक युग की समाप्ति एवं तत्पश्चात आने वाले कालों में महिलाओं की प्रतिष्ठा अपेक्षाकृत कम हुयी किन्तु मध्य युग में वाहय शक्तियों के आगमन के पश्चात यह निम्नतर होती गयी | सती प्रथा, पर्दा प्रथा , बाल विवाह, हलाला निकाह, तीन तलाक, देवदासी प्रथा, विधवा विवाह निषेध जैसी अनेको परम्पराओं एवं रूढ़ियों का ग्रास महिला ही बनी | इतिहास के सभी विशाल युद्धों से सर्वाधिक प्रभावित स्त्री – वर्ग ही रहा क्योकि पुरुष संरक्षक की अनुपस्थिति में शोषण एक अवसर बन गया | साथ ही समाज में किन्हीं भी रूप में हिंसा का सर्वाधिक भोगी स्त्री ही रही, क्योंकि यह विजेता के लिए पुरस्कार एवं पराजित पक्ष के अहं भाव को कुचलने का प्रतीक बन गई | यह वही पितृसत्तामक अहं भाव है जो आज भी स्त्री को निम्नतर दिखाने के लिए अनेक स्त्री हिंसात्मक कृतियों के रूप में समाज में प्रस्तुत होता है | स्त्री सशक्तिकरण का विषय सभी समाजो में किसी न किसी रूप से सर्वदा से व्याप्त रहा है | वर्तमान विकासशील देशों में यह अधिक दृष्टिगत है किन्तु विकसित देश भी इससे अछूते नहीं है | विश्व शक्ति का गुमान रखने वाला USA जो कि सर्वाधिक प्राचीन लोकतंत्र भी है, 200-250 वर्षो के राजनीतिक इतिहास में महिला राजप्रमुख (राष्ट्रपति) निर्वाचित नहीं कर सका | ब्रिटेन में सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार 1926-27 में दिया गया | अनेक विकसित देशों में अनेक आंदोलनों के माध्यम से ही स्त्री अधिकार सुनिश्चित किए जा सकते हैं और यह सभी देशों में अभी भी छोटे बड़े रूप में व्याप्त है | विकासशील देशों में इन आन्दोलनों या चर्चाओं की प्रवत्ति अधिक है | जो कि स्वभाविक है क्योंकि वैश्विक GDP में महिलाओं की भागीदारी अभी भी मात्र 12-14% ही है | जबकि वैश्विक आबादी का 49.6% महिला है | अतः ‘आधी आबादी’ के पूर्ण सहयोग के बिना विश्व में विकास की कल्पना व्यर्थ है |

“विकास के लिए महिलाओं के सशक्तिकरण से
बेहतर कोई उपाध्य नहीं है |”

UN के अनुसार महिला सशक्तिकरण के 5 घटक हैं –

  • महिलाओं में आत्ममुल्य का धारणा

  • विकल्प रखने और निर्णय करने का अधिकार

  • अवसरों तथा संसाधनों तक पहुंच का अधिकार

  • घर के अन्दर अथवा बाहर, दोनों स्तिथियों में स्वजीवन को नियंत्रित करने का अधिकार

  • राष्ट्रिय तथा अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अधिक न्यायोचित सामाजिक एवं आर्थिक व्यवस्था के सृजन हेतु सामाजिक परिवर्तन की दिशा को प्रभावित करने की योग्यता व अधिकार

प्रश्न उठता है कि क्या ‘महिला सशक्तिकरण’ हो जाना चाहिए महिलाओं के लिए काफी होगा? क्या समाज को ‘स्त्री’ जैसी सांस्कृतिक पहचान से मुक्ति मिल सकेगी? क्या महिला भी पुरुष के समान जीवन की गरिमा एवं क्षमता से युक्त हो सकेगी?

में समाज के विकास की स्थिति का आकलन उस समाज की स्त्रियों के अधिकार पर करता हूँ |” – डॉ आंबेडकर

भारत वह भूमि है :- जहाँ कहा जाता है – ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता’ एवं महिला को देवी का दर्जा दिया जाता है वहीँ दूसरी तरफ परम्परा के नाम पर मंदिरों में प्रवेश नहीं दिया जाता है | सबरीमाला जैसे मुद्दे पर स्त्री प्रवेश को अनुचित बताने वाली एक मात्र महिला जज इंदु मल्होत्रा ही थी जबकि अन्य 4 पुरुष जज इसे अनुचित करार देते हैं | पंचायती राज स्तर पर महिलाओं हेतु स्थानों के 33.3% आरक्षण के संवैधानिक प्रावधान के बावजूद ‘सरपंच पतियों’ की संकल्पना मौजूद हैं | साथ ही आजादी के 70 साल बाद भी संसद में महिला प्रतिनिधि मात्र 11.8% लोकसभा तथा 11% राज्यसभा में है | महिला आरक्षण विधेयक को सभी शासित दलों द्वारा एकस्वर में नकार दिया जाता है | समान कार्य, समान वेतन के संवैधानिक प्रावधान के बावजूद महिलाएं पुरुषों की अपेक्षा समान कार्य के बावजूद 28-30% कम वेतन प्राप्त करती हैं | सेना में महिलाओं को अभी तक स्थायी नियुक्ति का अधिकार प्राप्त नहीं है | मीडिया में अपनी आवाज उठाने की शक्ति के साथ-साथ साइबर बुलिंग, ट्रोलिंग, इमेजमॉर्फिंग आदि से सर्वाधिक पीड़ित महिलायें ही है | मंगलमिशन जैसे उत्कृष्ट प्रौद्योगिक सफलता के बावजूद महिलाओं की तकनीकि क्षमता को संदेहास्पद श्रेणी में रखा जाता है | ऐसे अनेक समाजिक विरोधाभास वर्तमान भारीतय समाज का हिस्सा है जो एक तरफ स्त्री सशक्तिकरण की प्रगतिशील छवि प्रस्तुत करते हैं तथा दूसरी तरफ अंतनिहित विरोध भी |

भारत में महिलाओं को कानूनी रूप से पैतृक संपत्ति का अधिकार प्राप्त है, किन्तु वे इसे स्वत: ही नकार देती है क्योंकि समाज में ‘आदर्श बेटी’ की सही स्थापना है | दहेज के नाम पर शोषक एवं शोषित दोनों ही महिलाएं है | कई मामलों में कन्या भ्रूण हत्या में भी स्त्री ही दोषी संबंधी के रूप में होती है |

अत: आव्यशकता है महिलाएं स्वयं अपने एवं अन्य महिला के प्रति जागरूक होकर सहयोगात्मक रुख अपनाएं तथा सशक्तिकरण के मार्ग पर साथी बने, प्रत्योगी नहीं | समय है कि प्रकृति के निर्धारित नियमों के आधार पर स्त्री-पुरुष को समान समझा जाये | सभ्यता का विकास सद्भाव पूर्ण सामंजस्य एवं समानता में ही निहित है | प्रकृति ने स्त्री को प्रजाति वृद्धि की अद्भुत क्षमता प्रदान की है इसे एक महत्वपूर्ण जिम्मेदारी माना जाना चाहिए न कि स्त्री कि कमजोरी | ‘जीवन की शुरुआत स्त्री शरीर में होती है’ तो उसे ही शारीरिक रूप से कमजोर कैसे माना जा सकता है? तर्कत: यह उचित नहीं है शारीरिक पहचान के अलावां स्त्री एक बौद्धिक प्राणी भी है, इसे स्वीकारना इतना मुश्किल नहीं होना चाहिए | ‘महिला सशक्तिकरण’ की आव्यशकता ही नहीं होगी यदि हम प्रकृति की शक्ति एवं नियम का सम्मान करें | ‘समान अस्तित्व’ एवं जीवन के ‘समान अंश के रूप में स्वीकृत होने पर नारी स्वत: सशक्त हो जाएगी’ |

“स्त्री आपको जन्म देती है, आपको पोषित करती है आपसे प्रेम करती है, आपको संवेदित करती है फिर भी वह एक वस्तु रहती है, आपसे निम्नतर मान ली जाती है” – डुबोस हेवर्ड

इस प्रकार कहा जा सकता है कि पूज्य ‘अर्द्धनारीश्वर’ प्रतीक को आदर्श मानते हुए इसे जीवन व्यवहार में कार्यान्वित करने का प्रयास किया जाना ही वास्तविक महिला सशक्तिकरण होगा |